पद-परिचय किसे कहते है - संज्ञा, सर्वनाम, वचन, लिंग, विकारी शब्द की उदहारण सहित परिभाषा

पद-परिचय किसे कहते है – संज्ञा, सर्वनाम, वचन, लिंग, विकारी शब्द की उदहारण सहित परिभाषा

पद-परिचय की परिभाषा

शब्द भाषा की अर्थवान स्वतंत्र इकाई है, तो वाक्य में प्रयुक्त शब्द ‘पद‘ है। वाक्य में आए ‘पदों’ का विस्तृत व्याकरणिक परिचय प्रस्तुत करना ही पद-परिचय कहलाता है।

पद-परिचय देने के लिए शब्दों के भेद, उपभेद, लिंग, वचन, कारक आदि का भी परिचय देना होता है। पद-परिचय में निम्नलिखित बातें बताई जानी चाहिए :

  1. संज्ञा-संज्ञा के तीनों भेद (जातिवाचक, व्यक्तिवाचक, भाववाचक), लिंग, वचन, कारक तथा क्रिया के साथ उसका संबंध (यदि होतो)।
  2.  सर्वनाम- सर्वनाम के भेद (पुरुषवाचक, निश्चयवाचक, अनिश्चयवाचक, संबंधवाचक, प्रश्नवाचक), पुरुष, लिंग, वचन, कारक तथा क्रिया के साथ उसका संबंध।
  3. विशेषण- विशेषण के भेद (गुणवाचक, परिमाणवाचक, संख्यावाचक, सार्वनामिक), लिंग, वचन, विशेष्य (जिसकी विशेषता बता रहा है)।
  4. क्रिया- भेद (अकर्मक, सकर्मक, प्रेरणार्थक, समस्त, संयुक्त, नामिक, पूर्वकालिक, मिश्र आदि), लिंग, वचन, पुरुष, धातु, काल,
    वाच्य, प्रयोग, कर्ता व कर्म का संकेत।
  5. क्रियाविशेषण- भेद (रीतिवाचक, स्थानवाचक, कालवाचक, परिमाणवाचक) तथा उस क्रिया का उल्लेख जिसकी विशेषता बता रहा है।
  6. समुच्चयबोधक– भेद (समानाधिकरण, व्यधिकरण) जिन शब्दों, पदों, वाक्यों को मिला रहा है उनका उल्लेख ।
  7. संबंधबोधक– भेद, जिसमें संबंध है उन संज्ञा/सर्वनामों का निर्देश।
  8. विस्मयादिबोधक- भेद तथा कौन-सा भाव प्रकट कर रहा है।




पद-परिचय से पूर्व सभी पदों का संक्षिप्त परिचय अपेक्षित है।

विकारी शब्द की परिभाषा – पद-परिचय

संज्ञा, सर्वनाम, विशेषण तथा क्रिया शब्द ‘विकारी‘ कहे जाते हैं, क्योंकि इनके वाक्य में प्रयुक्त होने वाले विभिन्न रूप मिलते हैं।

1. संज्ञा किसे कहते है – पद-परिचय

1. हरीश का घर दिल्ली में है।

2. मदन घोड़े की सवारी कर रहा है।

3. लखनऊ गोमती के किनारे पर बसा हुआ है।

4. क्रोध मनुष्य को पागल बना देता है।

5. बुढ़ापा सभी रोगों का घर है।

6. ईमानदारी बहुत ही महत्त्वपूर्ण गुण है।

इन वाक्यों में आए हरीश और मदन व्यक्तियों के नाम हैं तथा दिल्ली और लखनऊ शहरों के। गोमती नदी का नाम है, घोडा तथा मनुष्य जानवर तथा आदमियों की जाति विशेष बताने वाले शब्द हैं। क्रोध भाव विशेष का नाम है, बुढ़ापा अवस्था को बता रहा है तथा ईमानदारी गुण बताने वाला शब्द है। वस्तुत: ये सभी शब्द किसी-न-किसी के नाम को बता रहे हैं। व्याकरण में जो शब्द किसी के नाम को बताते हैं ‘संज्ञा’ शब्द कहे जाते हैं।

संज्ञा की परिभाषा :- किसी व्यक्ति, वस्तु, स्थान, स्थिति, गुण अथवा भाव के नाम का बोध कराने वाले शब्दों को संज्ञा कहते हैं।

संज्ञा को निम्नलिखित आधारों पर पहचाना जा सकता है :




1. संज्ञा शब्द प्राणीवाचक या अप्राणीवाचक हो सकते हैं; जैसे-

लड़का, चिड़िया, गाय प्राणीवाचक हैं और दाल, दुकान, पहाड़ अप्राणीवाचक हैं।

2. संज्ञा शब्द गणनीय या अगणनीय हो सकते हैं; जैसे-

सेब, लड़का आदि गणनीय संज्ञाएँ हैं जबकि पानी, हवा, क्रोध आदि अगणनीय।

3. संज्ञा पद वाक्य में कर्ता, कर्म, पूरक आदि की भूमिका निभा सकता है: जैसे-

दिव्य पढ़ रहा है। – (कर्ता के रूप में)

उसने राम को पढ़ाया। – (कर्म के रूप में)

4. संज्ञा पद के बाद परसर्ग आ सकते हैं: जैसे-

अलमारी में, मेज पर, घर का।

5. संज्ञा के पहले विशेषणों का प्रयोग हो सकता है; जैसे-

लंबा लड़का, छोटी गेंद, सफ़ेद ताजमहलं, काला जूता।

संज्ञा : भेद-प्रभेद – पद-परिचय

संज्ञा शब्दों से प्राय: किसी व्यक्ति, जाति या भाव के नाम का बोध होता है, इसलिए संज्ञा के तीन प्रमुख भेद किए जाते हैं :

1. व्यक्तिवाचक संज्ञा

2. जातिवाचक संज्ञा

3. भाववाचक संज्ञा।

1. व्यक्तिवाचक संज्ञा




जो संज्ञा शब्द किसी एक विशेष व्यक्ति, प्राणी, वस्तु या स्थान का बोध कराएँ, उन्हें व्यक्तिवान संज्ञा कहते हैं; जैसे-

  1. मनुष्यों के नाम – शीला, मदन, उरमिला, गीता आदि।
  2. प्राणियों के नाम – एरावत (हाथी का नाम), कामधेनु ( गाय का नाम)।
  3. वस्तुओं के नाम – गांडीव (धनुष का नाम), हल्दी ( मसाले का नाम) ।
  4. स्थानों के नाम – भारत, लखनऊ, दिल्ली, आगरा, जर्मनी आदि।

2. जातिवाचक संज्ञा

प्रत्येक व्यक्ति किसी-न-किसी जाति का सदस्य होता है; जैसे-दिल्ली, आगरा आदि नगर हैं। कामधेनु, एरावत जानवर हैं, शीला, मदन मनुष्य हैं, गंगा, यमुना और गोमती नदियाँ हैं। इस प्रकार ‘नगर’, ‘जानवर’ ‘मनुष्य’, ‘नदी’ आदि शब्द किसी जाति विशेष का बोध कराते हैं।

  • जातिवाचक नाम – बालक, नगर, कुत्ता, नदी, पर्वत
  • व्यक्तिवाचक नाम – रमेश, शीला, मुंबई, शैरी, गंगा, हिमालय

जो संज्ञा शब्द किसी जाति, पदार्थ, प्राणी, समूह आदि का बोध कराते हैं जातिवाचक संज्ञा शब्द कहलाते हैं।

कुर्सी, मेज़, किताब, पहाड़, नदी, सोना, चाँदी, कक्षा, सभा आदि सभी शब्द जातिवाचक संज्ञा के उदाहरण हैं।



जातिवाचक संज्ञा के दो उपभेद हैं

(क) द्रव्यवाचक संज्ञा (ख) समृहवाचक संज्ञा ये दोनों भी एक प्रकार से जाति का ही प्रकट करते हैं, अत: इन्हें जातिवाचक के उपभेदों के रूप में लिया जा रहा है :

(क) द्रव्यवाचक संज्ञा-कुछ संज्ञा शब्द ऐसे द्रव्य या पदार्थों का बोध कराते हैं, जिनसे अनेक वस्तुएँ बनती हैं। द्रव्य या पदार्थ का बोध कराने वाले संज्ञा शब्द को द्रव्यवाचक संज्ञा कहा जाता है; जैसे-

(1) स्टील, लोहा, पीतल – (बर्तनों के लिए)

(ii) लकड़ी – (फर्नीचर के लिए)

(iii) प्लास्टिक – (खिलौनों के लिए)

(iv) ऊन – (स्वेटर आदि के लिए)

(v) सोना-चाँदी – (आभूषणों के लिए)

द्रव्यवाची संज्ञा शब्दों का प्रयोग प्राय: ‘एकवचन’ में ही किया जाता है, क्योंकि ये शब्द गणनीय नहीं होते।

(ख) समूहवाचक संज्ञा-जो संज्ञा शब्द किसी समुदाय या समूह का बोध कराते हैं, समहवानक संज्ञा शब्द कहलाते है।  जहाँ भी समूह होगा वहाँ एक से अधिक सदस्यों की संभावना होगी; जैसे-दरबार, सभा, कक्षा, सेना, टोम, नाड, दल सभी समूहवाचक शब्द हैं। इन शब्दों का प्रयोग एकवचन में होता है, क्योंकि ये एक ही जाति के सदस्यों के समूह को एक इकाई के रूप में व्यक्त करते हैं।




3.  भाववाचक संज्ञा

जिन संज्ञा शब्दों से किसी व्यक्ति या वस्तु के गुण धर्म, दोष, शील, स्वभाव, अवस्था, भाव, संकल्पना आदि का बोध होता है, वे भाववाचक संज्ञा शब्द कहे जाते हैं। ये सभी अमूर्त संकल्पना व्यक्त करने वाले शब्द होते हैं; जैसे-ऊँचाई, निचाई, क्रोध, भय, प्रेम, बचपन, यौवन, बुढ़ापा, मोटापा, बेईमानी, प्यार, सुंदरता, प्रार्थना, चतुराई आदि।

(क) व्यक्तिवाचक संज्ञा का जातिवाचक संज्ञा के रूप में प्रयोग

व्यक्तिवाचक संज्ञा शब्दों का कई बार इस प्रकार प्रयोग दिखाई देता है कि उस संदर्भ में वे जातिवाचक संज्ञा की कोटि में आ जाते हैं। इसका कारण होता हैं-उस व्यक्ति विशेष के गुण। जब हम किसी प्रसिद्ध व्यक्त के नाम का प्रयोग उसके गुणों को बताने के लिए करते हैं, तब वे शब्द व्यक्तिवाचक संज्ञा न होकर जातिवाचक संज्ञा बन जाते हैं; जैसे-‘भीष्म पितामह’ दृढ़ प्रतिज्ञा या संकल्प के लिए विख्यात हैं। यदि कोई कहता है कि ‘मदन तो भीष्म पितामह है उसे रास्ते से कोई नहीं डिगा सकता’ तो यहाँ’ भीष्म पितामह’ व्यक्तिवाचक संज्ञा शब्द का प्रयोग ‘जातिवाचक संज्ञा’ के रूप में माना जाएगा। अन्य उदाहरण देखिए :

1. भाई! मुझ अभागे सूरदास की मदद करो।

2. वह तो विभीषण निकला, अपनों को हो धोखा दे गया ।

3. वह तो एकलव्य है, गुरु के लिए कुछ भी कर सकता है।

यहाँ सूरदास अंधे व्यक्तियों के लिए, विभीषण विश्वासघाती के अर्थ में तथा एकलव्य गुरुभक्तों के प्रतिनिधि के रूप में प्रयुक्त हुआ है।




(ख) जातिवाचक संज्ञा का व्यक्तिवाचक संज्ञा के रूप में प्रयोग

कुछ जातिवाचक शब्दों के अर्थ भी किसी व्यक्ति या स्थान के लिए रूढ़ हो जाते हैं; जैसे-‘ पंडित जी’ शब्द जातिवाचक है परंतु नेहरू जी के लिए रूढ़ हो गया है-‘पंडित जी हमारे देश के पहले प्रधानमंत्री थे’। यहाँ यह शब्द अब जाति का बोध न कराकर व्यक्ति का बोध करा रहा है। कुछ अन्य उदाहरण देखिए :

1. नेता जी ने इस देश के लिए अपना बलिदान दे दिया।  (नेता जी सुभाषचंद्र बोस)

2. महात्मा जी ने ही हमें आजादी दिलाई।  (महात्मा गांधी)

3. आज़ादी के बाद के भारत में सरदार के कामों को कॉन नहीं जानता! (सरदार पटेल)

(ग) भाववाचक संज्ञा शब्दों का जातिवाचक संज्ञा के रूप में प्रयोग

भाववाचक संज्ञा शब्दों का प्रयोग एकवचन में होता है लेकिन जब कभी कुछ भाववाचक संज्ञा शब्द बहुवचन में प्रयुक्त होते हैं, तब वे ‘जातिवाचक’ बन जाते हैं; जैसे-

1. किसी में इतनी बुराइयाँ हो सकती हैं, मैं सोच नहीं सकता।

2. लिंग

3. ऊँचाइयाँ नापनी हों तो पर्वतों की सैर करो।

4. अब तो दूरियाँ भी नजदीकियाँ बन गई हैं।




लिंग की परिभाषा – पद-परिचय

लिंग शब्द का अर्थ है-चिहून या पहचान का साधन।

शब्द के जिस रूप से यह पता चले कि वह पुरुष जाति का है या स्त्री जाति का, उसे व्याकरण में लिंग’ कहते हैं।

हिंदी में दो लिंग हैं-पुल्लिंग और स्वीलिंग ।

प्रत्येक संज्ञा शब्द या तो पुल्लिंगवाची होगा अथवा स्त्रीलिगवाची, क्योंकि बिना लिंग से गुढ़ वह वाक्य में प्रयुक्त नहीं हो सकता। वाक्य में क्रिया का रूप संज्ञा के लिंग तथा वचन के अनुसार बदलता है; जैसे-‘घोड़ा दौड़ता है। घोड़ी दौड़ती है।’ साथ ही अनेक विशेषण शब्द भी संज्ञा के लिंग के अनुसार परिवर्तित होते हैं; जैसे- ‘काला घोड़ा/ काली घोड़ी’।

हिंदी के बहुत से शब्दों में पूल्लिंग तथा स्त्रीलिंग शब्दों का निर्धारण उनके लिंग के आधार पर कर लिया जाता है;

जैसे -कुल्ता-कुतिया, लड़का-लड़की आदि। कुछ शब्दों के आरंभ में नर या मादा शब्द भी लगा देते हैं; जैसे-नर कौवा- मादा कौवा। किन्तु
अधिकतर प्राणियों के लिंग तय होते हैं और प्रत्येक भाषा-भाषी उनको परंपरा से सीख लेता है।




उभयलिंगी शब्द- कुछ शब्द ऐसे भी होते हैं जिनका प्रयोग दोनों लिंगों (पुल्लिंग तथा स्त्रीलिंग) में हो सकता है । इन शब्दों में लिंग परिवर्तन नहीं होता; जैसे-प्रधानमंत्री, मंत्री, इंजीनियर, डॉक्टर, पैनेजर आदि । उदाहरण : डॉक्टर घर चली गई हैं ।

3 बचन की परिभाषा – पद-परिचय

शब्द के जिस रूप से एक अथवा अनेक का बोध होता है उसे ‘वचन’ कहते हैं ।

जैसे-लड़का -» लड़के, किताब – किताबें आदि।

हिंदी में वचन दो होते हैं-एकवचन तथा बहुवचन। जहाँ किसी एक वस्तु का बोध होता है वहाँ एकवचन जैसे – किताब किताबें, कलमें, दुकानें, दुकान, कलम आदि और जहाँ एक से अधिक का बोध होता है; जैसे-किताबें, कलमें, दुकानें आदि वहाँ बहुवचन होता है।

गणनीय तथा अगणनीय संज्ञा शब्द




कुछ संज्ञाओं की गिनती की जा सकती है और कुछ की नहीं । उदाहरण के लिए, किताबे , चारपाई, तकिए आदि ऐसी संज्ञाएँ हैं जिनको हम गिन सकते हैं लेकिन दूध, पानी, दही आदि को गिना नहीं जा सकता । इनकी तो केवल नाप-तौल ही कर सकतें हैं । जिन संज्ञाओं की गिनती की जा सकती है वे गणनीय संज्ञा शब्द कहे जाते हैं तथा जिनकी गिनती करना संभव नहीं है उनको अगणनीय संज्ञा शब्द कहते हैं । दोनों प्रकार की संज्ञाओं में प्रमुख अंतर इस प्रकार है :

गणनीय संज्ञा

अगणनीय संज्ञा

।. इनकी गिनती करके बताया जा सकता है कि कौन-सा समूह बड़ा है और कौन-सा छोटा।इनकी गिनती नहीं की जा सकती । केवल नाप-तौल कर के ही बता सकते हैं कि कौन अधिक है और कौन कम।
2. इनके साथ संख्यावाची विशेषणों का प्रयोग हो सकता है; जैसे-दस किताबें, पाँच लड़के आदि। हैंइनके साथ केंवल परिमाणवाची विशेषण ही लग सकते ; जैसे-बहुत आटा, पाँच लीटर तेल आदि।
जातिवाचक संज्ञाएँ इस वर्ग में आती हैं ।इस वर्ग में समूहवाचक (एकवचन में प्रयुक्त ) , द्रव्यवाचक: तथा भाववाचक संज्ञाएँ आती हैं ।

4. कारक  की परिभाषा – पद-परिचय




“कारक’ शब्द का अर्थ होता है-‘ क्रिया को करने वाला । वाक्य में क्रिया को पूरा कराने में अनेक संज्ञा शब्द संलग्न होते हैं। इन संज्ञाओं के क्रिया शब्दों के साथ विभिन्न प्रकार के संबंध हो सकते हैं । इन्हीं संबंधों को व्यक्त करने वाली व्याकर्रणिक कोटि ‘ कारक’ कही जाती है । संज्ञा शब्द वाक्य में प्रयुक्त होकर अलग-अलग व्याकरणिक कार्य संपन्न करते हैं, अतः वे अलग-अलग कारकों में देखे जा सकते हैं;

जैसे-मोहन ने कुत्ते को डंडे से मारा । इस वाक्य में क्रिया है ‘ मारना’ । इस क्रिया को संपन्न करने में तीन संज्ञाओं का प्रयोग हुआ है-मोहन, कुत्ता तथा डंडा अर्थात्‌ मारने की क्रिया संपन्न कर रहा है मोहन, मार रहा है कुत्ते को तथा मारने के लिए डंडे को साधन के रूप में प्रयुक्त कर रहा है । व्याकरण में संज्ञा शब्दों का क्रिया के साथ संबंध अलग-अलग कारकों दूवारा प्रदर्शित किया जाता है। यहाँ ‘मोहन’ कर्ता  कारक में है, *कुत्ता’ कर्म कारक में तथा “डंडा’ करण कारक में । इस प्रकार,

करक वह व्याकरणिक कोटि है, जो वाकया में आये संज्ञा आदि शब्दों का क्रिया के साथ संबध बताती है।

कारकों से यह स्पष्ट हो जाता है कि अमुक संज्ञा वाक्य की क्रिया के साथ किस प्रकार की भूमिका का निर्वाह कर रही है।



कारको के भेद

करक विभक्तियाँ 
कर्ता (क्रिया को करने वाला )ने अथवा बिता किस चिहन के।
कर्म (जिस पर क्रिया का प्रभाव या फल पड़ता है )को अथवा बिता किस चिहन के।
करण (वह साधन जिससे क्रिया संपन्न होती है )से, के, द्वारा, के साथ (साधन सूचक)
सम्प्रदान (जिसके हिट की पूर्ती क्रिया से होती हो )संप्रदान (जिसके हित की पूर्ति क्रिया से होती हो)
अपादान (जिससे अलग होने का, तलना या दरी होने का भाव प्रकट हो)से (पृथकता सूचक)
संबंध (क्रिया से भिन्न किसी अन्य पद से संबंध बताने वाला)का, की, के; रा, री, रे; ना, नी, ने
संबोधन कारक (जिस संज्ञा को संबोधित किया जाए) ।में, पर
अधिकरण कारक (क्रिया के संचालन का आधार)अरे, रे, ओ, हे, अरी, री




कर्म और संप्रदान कारक में अंतर

वाक्य में कर्म दो प्रकार के होते हैं। जो निजीव संजा क्रिया पर क्या के उत्तर  में मिलती है वह प्रत्यक्ष कर्म होती है; जैसे-‘ बच्चे, ने सेब खाया’ वाक्य में ‘सेव’ प्रत्यक्ष कर्म है। लेकिन जन प्रत्यक्ष का किमी चेतन संज्ञा के लिए वाक्य में आता है, तो बह चेतन संज्ञा अप्रत्यक्ष कर्म कही जाती है; जैसे-‘बच्चे ने शीला को सेव दिया’ में “सेब’ (प्रत्यक्ष कर्म) शीला के लिए दिया गया है, अतः ‘शीला’ यहाँ ‘अप्रत्यक्ष कर्म‘ है। जो क्रियाएँ दो कर्म ले सकती हैं वे दुविकर्मक कही जाती हैं।

जहाँ तक कारक का संबंध है अप्रत्यक्ष कर्म सदैव संप्रदान कारक में होता है। यदयांपि इसके साथ प्राय: को परसर्ग लगा रहता है, परंतु इस “को” को देखकर इसे कर्म कारक का “को” नहीं समझ लेना चाहिए। यह को वस्तुत: अर्थ के स्तर पर के लिए का समकक्षी है। देखिए अन्य उदाहरण :

(क) मैंने माता जी को पत्र भेजा।

(ख) उसने बच्चों को कविता सुनाई।

(ग) पिता जी ने माला को साइकिल दी।

कर्म कारक और संप्रदान कारक दोनों में को विभक्ति का प्रयोग होता है। कर्म कारक में जिस शब्द के साथ को जुड़ा होता है, उस पर क्रिया का फल पडता है;

जैसे- सुरेंद्र ने महेंद्र पढ़ाया। (‘पढ़ाया’ क्रिया का कर्म)




संप्रदान कारक के चिहन को का अर्थ के लिए या के बास्ते होता है। संप्रदान कारक में किसी को कुछ देने या किसी के लिए कुछ काम करने का बोध होता है; जैसे-

गरीबों को भोजन और बस्त्र दे दो। (गरीबों के लिए/के वास्ते )

यहाँ पढ़ने को पुस्तकें नहीं मिलतीं। (पढ़ने के लिए के बास्ते)

संप्रदान में देने या उपकार करने का भाव मुख्य होता है।

करण और अपादान में अंतर – पद-परिचय

करण’ तथा ‘ अपादान’ दोनों कारकों का विभक्ति चिह्न से हैं, किंतु अर्थ की दृष्टि से दोनों में भेद है। करण कारक में से सहायक साधन का सूचक है जबकि अपादान कारक में से अलगाव का; जैसे-

1. चौर सिपाही से डरता है।

2. वह कल आगरा से लौटा है।

करण कारक – राम गाडी से आया है।

अपादान कारक – राम स्टेशन से आया है।

करण कारक –  तुम पेंसिल से लिखते हो।

अपादान कारक – वृक्ष से पत्ते गिरते हैं।

सर्वनाम की परिभाषा – पद-परिचय

वाक्यों में संज्ञा की पनरावृत्ति बचाने के लिए संज्ञा के स्थान पर जिन शब्दां का प्रयोग किया जाता है, वे ‘सर्वनाम कहे जाते हैं।

पुरुषवाचक सर्वनाम




जब हम बातचीत करते हैं तो कोई-न- कोई  श्रोता हमारे सामने अवश्य होता है। कभी तो हम आपने बारे  में बात करते हैं, कभी सामने वाले (श्रोता) के बारे में और कभी किसी तीसरे व्यक्ति के बारे में जो वहाँ उस समय उपस्थित नहीं होता।। ऐसी स्थिति में इन तोनों ही व्यक्तियों (पुरुषों) बोलने वाले, सुनने वाले तथा जो वहाँ उपस्थित नहीं है के के लिए जिन सर्वनाम शब्दों का प्रयोग करते हैं, वे पुरुषवाचक सर्वनाम कहे जाते हैं।

जो पुरुष (व्यक्ति) सामने उपस्थित नहीं है वह वक्ता तथा श्रोता के लिए अन्य व्यक्ति हुआ। व्याकरण में उसे अन्य पुरुष कहा जाता है। यदि किसी से पूछा जाए कि संसार में सबसे अधिक उत्तम व्यक्ति कौन है तो शायद हर व्यक्ति अपने को सर्वोत्तम बताएगा। इस दृष्टि से बोलने वाला (वक्ता) हुआ उत्तम पुरुष अब रह गया श्रोता। श्रोता की स्थिति उत्तम और अन्य पुरुष के मध्य की है, अत: वह कहलाया मध्यम पुरुष । इस प्रकार पुरुषवाचक सर्वनाम के तीन भेद हो जाते हैं।

(क) उत्तम पुरुष – वक्ता या बोलने वाला व्यक्ति अपने नाम के स्थान पर जिन सर्वनाम शब्दों का प्रयोग करता है वे उत्तम पुरुष सर्वनाम कहे जाते हैं। मैं (एकवचन) तथा हम (बहुवचन) इसके अंतर्गत आते हैं।

(ख) मध्यम पुरुष – वक्ता के दुवारा श्रोता के नाम के स्थान पर जिन सर्वनामों का प्रयोग किया जाता है, उन्हें मध्याম सर्वनाम कहते हैं। तू तुम तथा आप मध्यम पुरुष सर्वनाम के उदाहरण हैं।

(ग) अन्य पुरुष – वक्ता तथा श्रोता से भिन्न अनुपस्थित अन्य तीसरे व्यक्ति या वस्तु के स्थान पर जिस सर्वनाम का प्रयोग किया जाता है, वह अन्य पुरुष सर्वनाम कहलाता है । अन्य पुरुष सर्वनाम के अंतर्गत वह (एकवचन) तथा वे (बहवचन) अन्य पुरुष उत्ताम रूप आते हैं।

निश्चयवाचक सर्वनाम




वे सर्वनाम जो किसी व्यक्ति, वास्तु, घटना, आदि का निश्चित बोध करते है निश्चयवाची सर्वनाम कहलाते हैं। यह निश्चित बोध समीप की वस्तुओं का भी हो सकता है तथा दूर की वस्तुओं का भी। दूरवर्ती या दूर की वस्तुओं/व्यक्तियों के लिए वह और समीप की वस्तुओं के लिए यह का प्रयोग होता है; जैसे- (दूर पड़ी किताब के लिए) वह ले आओ।

अनिश्चयवाचक सर्वनाम

कभी-कभी ऐसा भी होता है कि किसी वस्तु या व्यक्ति का हमें आभास तो रहता है, परंतु निश्चयपूर्वक यह बताना कठिन होता है कि वह वस्तु क्या है या वह व्यक्ति कौन है। किसी वस्तु या व्यक्ति के संबंध में जब इस प्रकार की अनिश्चयपूर्ण स्थिति हो, तब जिन सर्वनामों का प्रयोग किया जाता है वे अनिश्नयवाचक सर्वनाम कहे जाते हैं। अत: अनिश्चवाचक सर्वनाम वे सर्वनाग होते हैं जिनसे किसी निश्चित व्यक्ति, प्राणी अथवा वस्तु का बोध न होता हो। हिंदी में इस अनिश्चितता को प्रकट करने के लिए हम कोई (व्यक्ति के लिए) तथा कृुछ (वस्तु के लिए) सर्वनामों का प्रयोग करते हैं; जैसे-

(क) मुझे ऐसा लगा जैसे झाड़ियों में कोई खड़ा है। किसी व्यक्ति, वस्तु, धटना आदि का निश्चत बोध कराते हैं, निश्चयवाचक सर्वनाम
(पास रखी घड़ी के लिए) -यह लाना जरा।

(ख) आपको कोई बुला रहा है।

(घ) बच्चों के लिए बाज़ार से कुछ ले आना।

(ग) कुछ खाकर बाहर जाना।

प्रश्नवाचक सर्वनाम

अनेक बार हमारे मन में किसी वस्तु, व्यक्ति, प्राणी या किसी घटना (क्रिया) के संबंध में प्रश्न उठते रहते हैं कि वह व्यक्ति कौन है, वह वस्तु या घटना क्या थी आदि आदि। इन प्रश्नों के लिए हम भाषा में कौन (व्यक्त के लिए) तथा क्या, कौन-सा, कौन-सी (वस्तु, घटना आदि के लिए) प्रश्नवाचक सर्वनामों का प्रयोग करते हैं: जैसे-

(क) कौन है वहाँ, सामने आओ।

(ख) मेरे साथ कौन चलेगा?

(घ) व्रत के दिन आप क्या खाते हैं?

(च) आपने इतने मकान देखे, बताइए कौन-सा पसंद आया?

(ग) आप आज शाम को क्या कर रहे हैं?

(ङ) इन किताबों में से कौन-सी चाहिए आपको?

इस प्रकार जो सर्वनाम किसी व्यक्ति, प्राणी, वस्तु, घटना आदि के बारे में प्रश्न का बोध कराते हैं, प्रश्नवाचक सर्वनाम कहलाते हैं।

संबंधवाचक सर्वनाम

कुछ सर्वनाम ऐसे होते हैं जो प्रधान उपवाक्य में आए संज्ञा या सर्वनामों के साथ आश्रित उपवाक्या के संबंध जोड़ने का कार्य करते हैं। ऐसे सर्वनामों को संबंधवाचक सर्वनाम कहा जाता है। हिंदी में जो, जिस संबंधवाचक सर्वनाम के उदाहरण हैं। देखिए निम्नलिखित उदाहरण :

(ख) वह पेंसिल लाओ जो पिता जी ने दिलाई थी।
(घ) यह वही लड़की है जिससे मदन की शादी हो रही हैं।
(च) जो झूठ बोलता है वह कभी आगे नहीं
(क) वह लड़का पकड़ा गया, जो कल यहाँ आया था।
(ग) यह वही फ़िल्म है जिसे तुम देखना चाहते थे।
(ङ) जिसको पैसा मिलेगा, वह काम क्यों नहीं करेगा?

निजवाचक सर्वनाम




निज शब्द का अर्थ होता है-‘अपना’। जिन सर्वनामों का प्रयोग रवयं के लिए किया जाता है वे निजवाचक सर्वनाम कहे जाते हैं : जैसे-

(क) मैं स्वयं चला जाऊँगा।

(ख) आप रहने दीजिए वह अपने आप ठीक कर लेगा।

(ग) वह आप ही अंदर आया था।

इस प्रकार हिंदी में स्वयं, अपने आप, आप ही आदि निजवाचक सर्वनाम हैं। निजवाचक सर्वनाम का संबंधवाची रूप अपनी, अपने भी बनता है।




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